Monday, June 14, 2010

नींद री गोली


हूक ने छुपाऊं 


पर कठै....

हूक रो भार घणो , दर्द रो बोझ बडो 

जी करै कोई बेली ने सुणाऊँ
बस! कै दूँ  और हलको हो जाऊं 

पर सगळा आप-आपरी घाणी घुमावण में लागोड़ा है 
आपरी पीड़ कोई और ने सुनावण में लागोड़ा है
बड़ो तेज़ ओ ज़मानो और बड़ी तेज़ घाण्यां री इस्पीड
सब आपरै ही अरमानां रो तेल निकालण में लागोड़ा है

फेर सोचूं ...

दुनिया रे आगे पग ना उघाड़ 
फाला ना दिखा, दुखती रग ना उघाड़
बात निकलेली तो कइं ठा कित्ती दूर जावेली 
कठे सूळ बण ऊगेली,  कद पग में लाग जावेली 

ओ ही सोचूं और चुप-चाप नींद री एक गोली निगल जाऊ हूँ 

नीद बड़ी मीठी होवे है
दर्द सूँ ज्यादा ढीठी होवे है

नींद री बायाँ में जग्यां बहुत है 
म्हें और म्हारी हूक , दोनूं ही समा जावां 
अलग अलग पसवाड़ा ले लां
अंधारो कर लां , सो जावां 

पर जद थोड़ी देर में
घुप्प घणे अंधेर में 
कोई म्हने झंझोड़े है
म्हारी नींद रा तागा तोड़े है 

फोरुं पसवाड़ो तो देखूं 
कै हूक जागती बैठी है 

"म्हें सोचूं हूँ ....एकली बैठी ही , थने भी जगा दूँ "

ई हूक ने छुपाऊं 
तो कठै ...


माने :
हूक : पीड़ा 
बेली : साथी 
सगळा : सभी 
घाणी : कोल्हू 
फाला : फफोले 
कईं ठा : क्या पता 
सूळ : काँटा 
ढीठी : ढीठ 
जग्यां : जगह 
पसवाडा : करवट 
जद : जब
घुप्प : गहरा 
तागा : धागे 
फोरुं : बदलता हूँ 




स-धन्यवाद :
योगिता बहड़ 





copyright © 2010 Yogesh Baher

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