Sunday, June 13, 2010

कितनी ज़ाहिर, कितनी ओझल...



आफ़ताब के तागे थामे चाँद तलक चढ़ जाता हूँ 
फिर थक कर लेट जाता हूँ तेरी शुआओं की गोद में 
सोता हूँ तो तेरी ज़ुल्फ़ की छुअन 
अक्सर चेहरे को सहलाती है

छूट कर फिर भागा है मन यादों के टीलों पर 
फिर टटोलने लगता है वो बरस-महीने-दिन-पहर 
जब हम तुम साथ थे, हाथों में हाथ थे 
फिर चांदनी में खो जाती हैं 
तसव्वुर के तकिये पर सर रख कर 
मेरी रातें सो जाती हैं ...

कितनी ज़ाहिर, कितनी ओझल 
यादें तेरी...

बे-शर्मी से लिपटी इन पलकों को 
सुबह-सुबह जो खींच कर अलग करता हूँ 
तो सामने तेरी यादों की अनगिन किरचें 
बिखरी मिलती हैं मुझको 
कमरे के बाहर: ओस की बूंदों में फैली 
कमरे के भीतर: बे-तरतीब किताबों सी बिखरी 

सब को बुहार कर भर लेता हूँ साँसों में 
तेरी यादों में नहा कर रोज़ निकलता हूँ मैं घर से 

कितनी ज़ाहिर, कितनी ओझल 
यादें तेरी...

दिन के जलते सूरज की किरनें 
जैसे मेरे ही इंतज़ार में बैठी थीं  
घर के बाहर बस निकला ही था 
के घेर लिया सौ हाथों से 

पर बादल के एक टुकड़े सी यादें तेरी 
मुझको लेकर चलती हैं साए में
तेरी यादों के साये-साये चलता हूँ 
तेरी यादों में भीगा-भीगा चलता हूँ  

कितनी  ज़ाहिर , कितनी  ओझल 
यादें  तेरी ...


copyright © 2010 Yogesh Baher

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