फ्रेम-दर-फ्रेम ये जिंदगी कि टेप,
बीते, बासे एहसासों पर एक और पर्त जमाती जाती है
वही एहसास, जिन्हें मन किसी पोटली में ठूंसता रहता है
अक्सर उसी पोटली में मुंह डालकर आज के सवालों के जवाब तलाशता है
बीते कल को धोया, याद्दाश्त कि रेज्माल से घिसा भी
पर परेशां हूँ,
वो बीता कल कभी आज के जैसा साफ़, ताज़ा नज़र नहीं आया
तत्क्षण की कोर से गुजर चुके एक भी किरदार को में वापस खींच न पाया
और वो, जो अब तक लिपटा पड़ा है फर्दा के बेनाप थान में
वो और परेशान किये जाता है, कि जाने किस रंग का होगा
दिन रात को उधेड़ता बुनता उसकी तैयारी करता हूँ
हाथ की बेमानी लकीरों में उसे भांपने कि कोशिशें करता हूँ
मैं पुरसुकून सोता, मगर फर्दा के नाक-नख्श जाने किसपे जाएँगे
ये खयाल मुझे जगाए रखता है
परदे के पीछे से उसका चेहरा देख लूं
इस फिराक में कभी परदे के आगे का नज़ारा भूल जाता हूँ
सबसे ज्यादा दर्द देता है लम्हा-ए-हाज़िर
फ्रेम दर फ्रेम बेरहमी से फिसलती जिंदगी की टेप
कभी एक पल के ठहराव में रोके रखती है
कभी झपकी पलकों की आड़ से महीने-साल सरका जाती है
जिंदगी कि ये टेप मेरे लम्स के परे है
पुरजोर कोशिश की कई-बारगी
अज़ल से देखे जा रहा हूँ तमाशाई बनकर
मगर एक लम्हा भी मेरे रोके से कहाँ रुका है....
copyright © 2010 Yogesh Baher
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