Tuesday, June 8, 2010

कुछ यूँ मिले ..



कभी तुम मुझे रौशनी से मिले थे 
बुझी ख्वाहिशों में नमी से मिले थे 

मैं ख़ुद को ख़ुदा सा समझने लगा था 
मुझे  तुम ख़ुदा में कमी से मिले थे

कहाँ फुर्सत-ए-बंदगी मुझको मिलती
सभी सिलसिले तो तुम्ही से मिले थे 

जहाँ उलझनों में सिरे खो गए हैं
दिलों के ये धागे वहीँ से मिले थे...

copyright © 2010 Yogesh Baher

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